जाने जगन्नाथ रथयात्रा के दौरान मनाये जाने वाले परमपराओं के बारे में

हर साल आषाढ़ माह के द्वितीया तिथि को जगन्नाथ रथयात्रा का आयोजन पूरी (ओड़िसा) में किया जाता है|

जाने जगन्नाथ रथयात्रा के दौरान मनाये जाने वाले परमपराओं के बारे में

रथ को बनने के लिए एक विशेष प्रकार के नीम की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है, जिसे ‘दारू’ कहते हैं

रथ को बनने में किसी भी प्रकार के कील या कांटेदार चीजों का प्रयोग नहीं किया जाता है

रथ बनने के लिए लकड़ी के चयन बसंत पंचमी के दिन किया जाता है और रथ बनाने की प्रक्रिया का प्रारंभ अक्षय तृतीय के दिन किया जाता है

भगवान बलभद्र के रथ को ‘तालध्वज’ कहते हैं, इनके रथ के रंग लाल और हरा होता है

देवी सुभद्रा के रथ को ‘दर्पदलन’ कहा जाता है, इनके रथ को बनाने में काले और नीले रंग का प्रयोग किया जाता है

भगवान जगन्नाथ के रथ को ‘गरुड़ध्वज’ कहते हैं, इनके रथ के रंग लाल और हरा होता है

भगवान जगन्नाथ के रथ में 16 पहिया होते हैं तथा इसे बनने में 332 टुकड़ो का प्रयोग किया जाता है

भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ की मुर्तिओं के हाथ, पैर और पंजे नहीं हैं मूर्तियाँ अधूरी हैं

भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ की मुर्तिओं के हाथ, पैर और पंजे नहीं हैं मूर्तियाँ अधूरी हैं

तीनों रथों के तैयार होने के बाद पूरी के गजपति रथों के पूजा का वृहद अनुष्ठान करते हैं जिसे ‘हर पहनरा’ के नाम से जाना जाता है|

तीनों रथों का विधि विधान से पूजा करने के बाद गजपति सोने के झाड़ू से रथ, मंडप, और रास्ते की सफाई करते हैं

रथ यात्रा मुख्य मंदिर से शुरु होकर गुड़ीचा मंदिर तक जाती है, गुड़ीचा मंदिर को मासी बाड़ी भी कहते हैं

भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ 7 दिनों तक गुड़ीचा मंदिर में विश्राम करते है भगवान जगन्नाथ के दर्शन को ‘आड़प दर्शन’ के नाम से जाना जाता हैं

आषाढ़ माह के दशवीं तिथि को सभी रथ मुख्य मंदिर को लौटते हैं| रथों के वापसी की होने वाले यात्रा को बहुडा यात्रा के नाम से जाना जाता है

एकादशी के दिन तीनों देवी देवतओं को मंदिर में वैदिक मंत्रोचार के साथ पुन: प्रतिष्ठित किया जाता है